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मूर्तिकार बाप और बेटा Sculptor father and his son in Hindi!

गांव में एक मूर्तिकार रहा करता था। वह काफी खूबसूरत मूर्तियां बनाया करता था और इस काम से वह अच्छा कमा लेता था। उसे एक बेटा हुआ। उस बच्चे ने बचपन से ही मूर्तियां बनानी शुरू कर दी।

बेटा भी बहुत अच्छी मूर्तियां बनाया करता था और बाप अपने बेटे की कामयाबी पर बहुत खुश होता था लेकिन बेटे की मूर्तियों में कोई ना कोई कमी निकाल दिया करता था। वह कहता था बहुत अच्छा किया है लेकिन अगली बार इस कमी को दूर करने की कोशिश करना। बेटा भी कोई शिकायत नहीं करता था।

 वो अपने बाप की सलाह पर अमल करते हुए अपनी मूर्तियों को और बेहतर करता रहा। इस लगातार सुधार की वजह से बेटे की मूर्तियां बाप से भी अच्छी बनने लगी। अब ऐसा टाइम भी आ गया कि लोग बेटे की मूर्तियों को बहुत ज्यादा पैसा देकर खरीदने लगे जबकि बाप की मूर्तियां उसकी पहली वाली कीमत पर ही बिक रही थी। बाप अब भी अपने बेटे की मूर्तियों में कमियां निकाल ही देता था लेकिन बेटे को अब यह अच्छा नहीं लगता।

वह बिना मन के उन कमियों को मान लेता था लेकिन फिर भी अपनी मूर्तियों में सुधार कर ही देता था।
फिर एक समय ऐसा भी आया कि जब बेटे के सब्र ने जवाब दे दिया। एक दिन जब बाप अपने बेटे की मूर्तियों में कमी निकाल रहा था तो बेटा बोला आप तो ऐसे कहते हैं कि आप जैसे बहुत बड़े मूर्तिकार है अगर आपको इतनी समझ होती तो आप की मूर्तियां कम कीमत में नहीं बिकती।

मेरी मूर्तियां परफैक्ट हैं मुझे नहीं लगता कि मुझे अब आपकी सलाह लेने की जरूरत है। बाप ने जब बेटे की यह बातें सुनी तो बेटे को सलाह देना और बेटे की मूर्तियों में कमियां निकालना बंद कर दिया। कुछ महीने तो वह लड़का खुश रहा लेकिन फिर उसने नोटिस किया कि लोग अब उसकी मूर्तियों की उतनी तारीफ नहीं करते जितनी पहले किया करते थे और उसकी मूर्तियों के दाम बढ़ना भी बंद हो गए। शुरू में तो बेटे को कुछ समझ नहीं आया लेकिन फिर वह अपने बाप के पास गया और उसे समस्या के बारे में बताया। बाप ने बेटे को बहुत शांति से सुना जैसे उसे पहले से पता था कि एक दिन ऐसा भी आएगा। इस बात को बेटे  ने भी नोटिस किया और उसने पूछा क्या आप जानते थे कि ऐसा होने वाला है। बाप ने कहा “हां” क्योंकि आज से कई साल पहले मैं भी हालात से टकराया था। बेटे ने सवाल किया तो फिर आप ने मुझे समझाया क्यों नहीं, बाप ने जवाब दिया क्योंकि तुम समझना नहीं चाहते थे।
मैं जानता हूं कि तुम्हारी जितनी अच्छी मूर्तियां मैं नहीं बनाता, यह भी हो सकता है कि मूर्तियों के बारे में मेरी सलाह गलत हो और ऐसा भी नहीं है कि मेरी सलाह की वजह से कभी तुम्हारी मूर्ति बेहतर बनी। लेकिन जब मैं तुम्हारी मूर्तियों में कमियां दिखाता था, तब तुम अपनी बनाई गई मूर्तियों से सेटिस्फाई नहीं होते और तुम खुद को बेहतर करने की कोशिश करते थे और वही बेहतर होने की कोशिश तुम्हारी कामयाबी का कारण था।
अपने काम से सेटिस्फाई (संतुष्ट) हो गए और तुमने यह भी मान लिया कि और बेहतर होने की गुंजाइश ही नहीं है जिससे तुम्हारी ग्रोथ भी रुक गई। लोग हमेशा तुमसे बेहतर की उम्मीद करते हैं। यही कारण है कि अब तुम्हारी मूर्तियों के लिए तुम्हारी पहले जितनी तारीफ नहीं होती और ना ही उनके लिए तुम्हें ज्यादा पैसे मिलते हैं।
बेटा थोड़ी देर चुप रहा फिर उसने सवाल किया तो अब मुझे क्या करना चाहिए? बाप ने एक लाइन में जवाब दिया अनसेटिस्फाई (असंतुष्ट ) होना सीख लो। मान लो कि तुम में हमेशा बेहतर होने की गुंजाइश बाकी है, यही तुम्हें हमेशा आगे बेहतर होने के लिए इंस्पायर्ड (प्रेरित) करती रहेगी और तुम्हें हमेशा बेहतर बनाते रहेगी।
तरक्की की गुंजाइश हमेशा रहती है